पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य बल को बढ़ावे।
पदार्थान्वयभाषाः - (अहम्) मैं [हे मनुष्य !] (ते) तेरे (पसः) राज्य को (आ) यथावत् (तनोमि) फैलाता हूँ (ज्याम् इव) जैसे डोरी को (धन्वनि अधि) धनुष में। (अनवग्लायता) विना ग्लानि वा थकावट के (सदा) सदा [शत्रुओं पर] (क्रमस्व) धावा कर, (ऋशः इव) जैसे हिंसकजन्तु, सिंह आदि (रोहितम्) हरिण पर ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे लक्ष्य वेधने के लिये धनुष में डोरी को दृढ़ कसते हैं, वैसे ही बलवान् पुरुष राज्यप्रबन्ध को प्रजा के सुख के लिये यथाशास्त्र दृढ़ रक्खे, और जैसे सिंह आदि हरिण आदि को दबोच लेते हैं, वैसे ही शत्रुओं पर धावा करके कुरीतियों को मिटावे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(आ) समन्तात् (अहम्) नीतिज्ञः (तनोमि) विस्तारयामि (ते) तव (पसः) म० ६। राष्ट्रम् (अधि) सप्तम्यर्थानुवादी (ज्यामिव) मौर्वीमिव (धन्वनि) कनिन् युवृषितक्षिराजिधन्वि०। उ० १।१५६। इति धन्व गतौ-कनिन्। धनुषि (क्रमस्व) वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः। पा० १।३।३८। इति आत्मनेपदम्। आक्रमस्व (ऋशः) इगुपधज्ञा०। पा० ३।१।१३५। इति ऋश हिंसायाम्-क। ऋशति शीर्यते हिनस्ति शत्रूनिति ऋशः। शूरो हिंसको जन्तुर्वा (रोहितम्) हृसृरुहियुषिभ्य इतिः। उ० १।९७। इति रुह प्रादुर्भावे-इति। मृगं हरिणम्-यथा, शार्दूलाय रोहित्। य० २४।३०। एको रोहिद् ऋष्यः शार्दूलाय-इति तद्भाष्ये महीधरः। शार्दूलाय महासिंहाय रोहित् रक्तगुणविशिष्टो मृगः-इति तत्रैव दयानन्दभाष्ये (अनवग्लायता) संश्चत्तृपद्वेहत्। उ० २।८५। इति अन्+अव+ग्लै हर्षक्षये-अति प्रत्ययः, स च शतृवत् अहर्षक्षयेण। अग्लानेन। आनन्देन (सदा) सर्वदा ॥
