पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य बल को बढ़ावे।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्य !] (यथा स्म) जिस प्रकार से ही (ते विरोहतः) तुझ वृद्धिशील का [मन विद्या से] (अभितप्तमिव) प्रतापयुक्त सा (अनति) चेष्टा करता है, (ततः) उस प्रकार से ही (ते=त्वाम्) तुझे (इयम् ओषधिः) वह ओषधि (शुष्मवत्तरम्) अधिक बलयुक्त (कृणोतु) करे ॥३॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार विद्याभ्यास से मनुष्यों का मन बढ़ता जावे उसी प्रकार परीक्षित उत्तम-उत्तम बलवर्धक वृषा आदि ओषधि और यथावत् आहार-विहार से अपना शरीरबल भी बढ़ावें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(यथा) येन प्रकारेण (स्म) खलु (ते) तव मनः (विरोहतः) रुह बीजजन्मनि प्रादुर्भावे च-शतृ। वृद्धिशीलस्य (अभितप्तम् इव) तप दाहैश्ययोः-क्त। प्रतापयुक्तं यथा (अनति) अनिति चेष्टते (ततः) तेनैव प्रकारेण (ते) द्वितीयार्थे षष्ठी। त्वाम् (शुष्मवत्तरम्) अधिकबलयुक्तम् (इयम्) पूर्वोक्तां कृपां (कृणोतु) करोतु (ओषधिः) औषधम् ॥
