पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
मनुष्य बल को बढ़ावे।
पदार्थान्वयभाषाः - (याम् त्वा) जिस तुझको (गन्धर्वः) वेद विद्या धारण करनेवाले पुरुष ने (मृतभ्रजे) नष्ट बलवाले (वरुणाय) उत्तम गुण युक्त मनुष्य के लिये (अखनत्) खना है, (ताम् त्वा) उस तुझ (शेपहर्षणीम्) सामर्थ्य बढ़ानेवाली (ओषधिम्) ओषधि को (वयम्) हम (खनामसि) खनते हैं ॥१॥
भावार्थभाषाः - जिस प्रकार पूर्व ऋषियों ने मनुष्य के हित के लिये परीक्षा करके श्रेष्ठ ओषधियों को प्राप्त किया है, उसी प्रकार हम उत्तम ओषधियों की परीक्षा और सेवन से बलवान् होकर सुखी रहें ॥१॥ संहिता के (शेपहर्षणीम्) के स्थान पर पदच्छेद में (शेपः हर्षणीम्) है ॥
टिप्पणी: १−(याम् त्वा) यां त्वाम् ओषधिम् (गन्धर्वः) अ० २।१।२। गां वाणीं पृथिवीं गतिं वा धरति धारयति वा सः। वेदवेत्ता पुरुषः (अखनत्) विदारितवान् (वरुणाय) अ० १।३।३। वरेण्याय वरणीयाय जीवाय (मृतभ्रजे) भ्रस्ज पाके-क्विप्, सलोपः। नष्टपाकसामर्थ्याय। नष्टबलाय (वयम्) आयुर्वेदज्ञाः (खनामसि) खनामः। विदारयामः (ओषधिम्) अ० १।३०।३। भेषजम् (शेपहर्षणीम्) पानीविषिभ्यः पः। उ० ३।२३। इति शीङ् शयने-प प्रत्ययः। शेते वर्त्तते स शेपः सामर्थ्यम्। हृष्यतेः करणे ल्युट्, टित्वाद् ङीप्। शेपस्य वीर्यस्य वर्धनीम् ॥
