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दि॒व्या॑दि॒त्याय॒ सम॑नम॒न्त्स आ॑र्ध्नोत्। यथा॑ दि॒व्या॑दि॒त्याय॑ स॒मन॑मन्ने॒वा मह्यं॑ सं॒नमः॒ सं न॑मन्तु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दिवि । आदित्याय । सम् । अनमन् । स: । आर्ध्नोत् । यथा । दिवि । आदित्याय । सम्ऽअनमन् । एव । मह्यम् । सम्ऽनम: । सम् । नमन्तु ॥३९.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:39» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (दिवि) आकाश में वर्तमान (आदित्याय) सूर्य को वे [ऋषि लोग] (सम्) यथाविधि (अनमन्) नमे हैं, (सः) उसने [उन्हें] (आर्ध्नोत्) बढ़ाया है। (यथा) जैसे (दिवि) आकाश में वर्तमान (आदित्याय) सूर्य को (सम्-अनमन्) वे यथावत् नमे हैं, (एव) वैसे ही (मह्यम्) मुझ को (सन्नमः) सब सम्पत्तियाँ (सम्) यथावत् (नमन्तु) नमें ॥५॥
भावार्थभाषाः - पहिले ऋषि महात्माओं के समान सूर्य के प्रकाश आदि से उपकार लेकर आनन्द प्राप्त करें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(दिवि) आकाशे वर्तमानाय (आदित्याय) अ० १।९।१। प्रकाशमानाय सूर्याय। अन्यत् पूर्ववत्-म० १ ॥