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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
गन्धर्व और अप्सराओं के गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्रस्य) परमेश्वर की (शतम्) सौ (हेतयः) हनन शक्तियाँ (हिरण्ययीः) तेजोमयी (ऋष्टीः) तरवारों के समान (भीमाः) भयानक हैं। (ताभिः) उनके साथ [दुष्ट दमन के लिये] (हविरदान्) ग्राह्य अन्न के भोजन करनेवाले (अवकादान्) हिंसाओं के नाश करनेवाले (गन्धर्वान्) वेदवाणी और पृथिवी के धारण करनेवाले पुरुषों को [वह परमेश्वर] (वि ऋषतु) व्याप्त होवे ॥९॥
भावार्थभाषाः - म० ८ के समान ॥९॥
टिप्पणी: ९−(हिरण्ययीः) हिरण्यः=हिरण्यमयः=निरु० १०।२३। हिरण्यमय्यः। तेजोमय्यः। अन्यत् पूर्ववत्-म० ८ ॥
