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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यम् ग्रामम्) जिस ग्राम में (इदम्) यह (उग्रम्) उग्र (मम) मेरा (सहः) बल (आ विशते) प्रवेश करता है। (पिशाचाः) पिशाच लोग (तस्मात्) उस स्थान से (नश्यन्ति) भाग जाते हैं और (पापम्) पाप को (न) नहीं (उप जानते) जानते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - प्रतापी नीतिनिपुण राजा के शासन में दुष्ट लोग उपद्रव नहीं मचाते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(यम्) (ग्रामम्) वसतिम् (आविशते) प्रविशति (इदम्) (उग्रम्) तीक्ष्णम् (सहः) बलम् (मम) मदीयम् (पिशाचाः, तस्मात्, नश्यन्ति) म० ७। (न) निषेधे (पापम्) पाति यस्मात् तत्। अनिष्टम् (उप जानते) अवबुध्यन्ते ॥
