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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो (देवाः) विजयी शूर (तेन) पुण्य के साथ (हासन्ते) चलना चाहते हैं, और (ये) जो (नदीषु पर्वतेषु) नदियों और पर्वतों पर (सूर्येण) सूर्य के साथ (जवम्) अपना वेग (मिमते) करते हैं (तैः) उन (पशुभिः) दृष्टिवाले देवताओं से (सम् विदे) मैं मिलता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - जो महात्मा लोग सूर्य के समान शीघ्रगामी होकर बड़े-बड़े कठिन कामों को सिद्ध करते हैं, उन से मिलकर सब मनुष्य उत्तम गुण प्राप्त करें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(ये) (देवाः) विजिगीषवः शूराः (तेन) तॄ तरणे-ड। पुण्येन-इति शब्दकल्पद्रुमः (हासन्ते) ओहाङ् गतौ-सनि छान्दसं रूपम्। जिहासन्ते। गन्तुमिच्छन्ति (सूर्येण) आदित्येन (मिमते) माङ् माने-लट्। उपमया सादृश्येन कुर्वन्ति (जवम्) स्ववेगम् (नदीषु) (पर्वतेषु) गिरिषु (ये) (तैः) (पशुभिः) अ० २।२६।१। द्रष्टृभिर्देवैः (सम् विदे) संजाने। संगच्छे ॥
