पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पिशाचान्) मांसभक्षकों को (सहसा) बल से (सहे) मैं जीतता हूँ, और (एषाम्) इनका (द्रविणम्) धन [सुपात्रों को] (ददे) मैं देता हूँ। (दुरस्यतः) सतानेवाले (सर्वान्) सबों को (हन्मि) मैं मारता हूँ। (मे) मेरा (आकूतिः) शुभ संकल्प (सम् ऋध्यताम्) यथावत् सिद्ध होवे ॥४॥
भावार्थभाषाः - राजा दुष्टों का हनन करके उनका धन सेनापति आदि योग्य पुरुषों को पारितोषिक देवे और प्रयत्नपूर्वक अपना शुभ संकल्प सिद्ध करे ॥४॥
टिप्पणी: ४−(सहे) अभिभवामि (पिशाचान्) अ० १।१६।३। पिशिताशिनो राक्षसान् (सहसा) बलेन (एषाम्) (द्रविणम्) अ० २।२९।३। धनम् (ददे) ददामि पात्रेभ्यः (सर्वान्) (दुरस्यतः) हन्तुमिच्छून् (हन्मि) नाशयामि (मे) मम (आकूतिः) अ० ३।२।३। शुभसंकल्पः (सम् ऋध्यताम्) सम्यक् सिध्यतु ॥
