0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ये) जो दुष्ट (आगरे) घर में (प्रतिक्रोशे) गूँजते हुए (अमावास्ये) अमावस के अन्धकार में (मृगयन्ते) खोजते फिरते हैं। (अन्यान्) दूसरों को (दिप्सतः) सतानेवाले (तान् सर्वान्) उन सब (क्रव्यादः) मांसभक्षी सिंह आदिकों को (सहसा) बल से (सहे) मैं जीतता हूँ ॥३॥
भावार्थभाषाः - रात्री के अन्धकार में जो सिंह आदि हिंसक पशु वा मनुष्य सतावें, राजा उनका यथावत् प्रबन्ध करे ॥३॥
टिप्पणी: ३−(ये) शत्रवः (आगरे) ॠदोरप्। पा० ३।३।७७। इति गॄ निगरणे-अप्। आगारे। गृहे (मृगयन्ते) मृग अन्वेषणे। अन्विच्छन्ति (प्रतिक्रोशे) प्रतिध्वनियुक्ते (अमावास्ये) अमा सह वसतश्चन्द्रार्कौ यस्याम्, अमा+वस निवासे-ण्यत्, टाप्। इति अमावास्या कृष्णपक्षान्ततिथिः। अ च। पा० ४।३।३१। इति अमावास्या-अ प्रत्ययः, जात इत्यर्थे। अमावास्यायां जाते कृष्णकाले (क्रव्यादः) अ० २।२५।५। मांसभक्षकान् सिंहादीन् (अन्यान्) इतरान् पुरुषान् (दिप्सतः) हिंसितुमिच्छून्। (सर्वान्) (तान्) (सहसा) बलेन (सहे) अभिभवामि ॥
