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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो पुरुष (अदिप्सतः) न सतानेवाले (नः) हमको (दिप्सत्) सताना चाहे, (च) और (यः) जो (दिप्सतः) सतानेवाले [हम] को (दिप्सति) सताना चाहता है, (तम्) उसको (वैश्वानरस्य) सब नरों के हितकारक (अग्नेः) ज्ञानीपुरुष के (दंष्ट्रयोः) दोनों डाढ़ों के बीच जैसे (अपि) अवश्य (दधामि) धरता हूँ ॥२॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य धर्मात्माओं को बिना कारण सतावे, और जो दुष्ट धर्मात्माओं को उनके दण्ड देने पर भी दुष्ट आचरण करे, उन शत्रुओं को राजा परमेश्वर के दिये सामर्थ्य से ऐसे कुचिल डाले जैसे डाढ़ों के बीच अन्न को ॥२॥
टिप्पणी: २−(यः) शत्रुः (नः) अस्मान् (दिप्सत्) लेटि अडागमः। दम्भितुं हिंसितुमिच्छेत् (अदिप्सतः) दम्भितुं हिंसितुमनिच्छतः (दिप्सतः) हिंसितुमिच्छतः (यः च) (दिप्सति) दम्भितुमिच्छति। जिहिंसिषति (वैश्वानरस्य) सर्वनरहितस्य (दंष्ट्रयोः) सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्। उ० ४।१५९। इति दंश दशने-ष्ट्रन्, अजादित्वात्-टाप्। खादनसाधनयोर्दन्तविशेषयोर्मध्ये यथा (अग्नेः) ज्ञानिनः पुरुषस्य (अपि) अवधारणे (दधामि) धरामि (तम्) शत्रुम् ॥
