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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
सब प्रकार की रक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (सुक्षेत्रिया) उत्तम खेत के लिये, (सुगातुया) उत्तम भूमि के लिये (च) और (वसुया) धनके लिये (यजामहे) हम [परमेश्वर को] पूजते हैं। (नः) हमारा (अघम्) पाप (अप शोशुचत्) दूर धुल जावे ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य परमेश्वर की महिमा जानकर अनिष्टों को मिटाकर पुरुषार्थ से अपनी प्रभुता बढ़ावें ॥२॥
टिप्पणी: २−(सुक्षेत्रिया) इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम्। वा० पा० ७।१।३९। इति ङेर्डियाजादेशः। चित्त्वादन्तोदात्तः शोभनाय क्षेत्राय (सुगातुया)। सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति ङेर्याच्। गातुः−पृथिवीनाम-निघ० १।१। शोभनभूमिप्राप्तये (वसुया) पूर्वसूत्रेण ङेर्याच्। वसुने धनाय (च) समुच्चये (यजामहे) परमेश्वरं पूजयामः। अन्यत्पूर्ववत् ॥
