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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वैरी के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे चोर !] (मृगस्य) पशु [अर्थात् तेरी गाह] के (दन्तः) दान्त (मूर्णा) बन्द वा मोंथरे (उ) और (पृष्टयः) पसलियाँ (अपि शीर्णाः) चूर-चूर [हो जावें], (ते) तेरी (गोधा) गोह (निम्रुक्) नीचे (भवतु) हो जावे, और (मृगः) वह पशु (शशयुः) सोता हुआ [निरुद्यमी होकर] (नीचा) नीचे (अयात्) आ जावे ॥६॥
भावार्थभाषाः - (गोधा) गोह वा गोसाँप एक छपकली जाति का जन्तु होता है, चोर उसको पूँछ में डोरी बाँधकर ऊँचे घरोंपर फेंक देते, और उसे पकड़ कर ऊपर चढ़ जाते हैं। मनुष्य घर ऐसे चिकने और दृढ़ बनावें और सावधानी रक्खें कि चोर, डाकुओं की गोह आदि फंदे घरों पर न चिपट सकें किन्तु निकम्मे होकर नीचे फिसल पड़ें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(मूर्णाः) मुर्व बन्धने-राल्लोपः। पा० ६।४।२१। इति वकारलोपः। रदाभ्यां निष्ठातो नः पूर्वस्य च दः। पा० ८।२।४२। इति तस्य नः। बद्धाः। कुण्ठिताः (मृगस्य) अ० २।३६।४। अन्वेषणशीलस्य। पशोः। गोधायाः (दन्ताः) हसिमृग्रिण्वामिदमि०। उ० ३।८६। इति दमु उपशमे-तन्। रदनाः। दशनाः (अपि-शीर्णाः) शॄ हिंसने-क्त। हिंसिताः। विदीर्णाः। त्रोटिताः (उ) अपि (पृष्टयः) पृषु सेके-क्तिच्। पर्शवः। पार्श्वास्थीनि (निम्रुक्) नि+म्रुचु गतौ-क्विप्। नीचगतिः (ते) तव। चोरस्य (गोधा) हलश्च। पा० ३।३।१२१। इति गुध परिवेष्टने-घञ्। टाप्। धनुर्गुणाघातवारणाय प्रकोष्ठबद्धा चर्मपट्टिका। जन्तुविशेषः (भवतु) (नीचा) सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। इति नीचैः डा। नीचैः (अयत्) अय गतौ लेट्। अडागमः। अयताम् गच्छतु (शशयुः) भृमृशीङ्तॄ० उ० १।७। इति शीङ् स्वप्ने-उ। बाहुलकाद् द्विर्वचनम्। शयुः शयानः। निरुद्यमः (मृगः) पशुः ॥
