पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वैरी के नाश का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (व्याघ्र) हे बाघ ! (ते) तेरी (अक्ष्यौ) दोनों [हृदय और मस्तक की] आँखों को (च) और (च) भी (ते मुखम्) तेरे मुख को, (आत्) और भी (सर्वान्) सब (विंशतिम्) बीसों (नखान्) नखों को (जम्भयामसि=०-मः) हम नष्ट करते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - जैसे हिंसक जन्तुओं को अङ्ग भङ्ग करके नष्ट कर देते हैं, इसी प्रकार मनुष्य अपने-अपने शत्रुओं को सेनादि और शरीर के अङ्गों से नष्ट करके प्रजा में शान्ति रक्खें ॥३॥
टिप्पणी: ३−(अक्ष्यौ) अ० १।२७।२। अक्षिणी। उभे मानसिकमस्तकनेत्रे। (मुखम्) अ० २।३५।५। आस्यम् (ते) तव (व्याघ्र) म० १। हे व्याघ्रेव हिंसक पुरुष (जम्भयामसि) म० ३। नाशयामः (आत्) अनन्तरम् (सर्वान्) सकलान् (विंशतिम्) पङ्क्तिविंशति०। पा० ५।१।५९। इति विन् शब्दात् शतिच् प्रत्ययान्तो निपातः। द्वे दशती। पादचतुष्टये पञ्चशोऽवस्थितान् (नखान्) अ० २।३३।६। नखरान् ॥
