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अधि॑ नो ब्रूतं॒ पृत॑नासूग्रौ॒ सं वज्रे॑ण सृजतं॒ यः कि॑मी॒दी। स्तौमि॑ भवाश॒र्वौ ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ तौ नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अधि । न: । ब्रूतम् । पृतनासु । उग्रौ । सम् । वज्रेण । सृजतम् । य: । किमीदी । स्तौमि । भवाशर्वौ । नाथित: । जोहवीमि । तौ । न: । मुञ्चतम् । अंहस: ॥२८.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:28» पर्यायः:0» मन्त्र:7


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (उग्रौ) हे उग्र स्वभाववाले तुम दोनों (नः) हम से (पृतनासु) संग्रामों में (अधि) अनुग्रह से (ब्रूतम्) बोलो और [उसको] (वज्रेण) वज्र के साथ (सम् सृजतम्) संयुक्त करो (यः) जो (किमीदी) अब क्या हो रहा है, यह क्या हो रहा है, ऐसा खोजनेवाला लुतरा पुरुष है। (नाथितः) मैं अधीन होकर (भवाशर्वौ) सुख उत्पन्न करनेवाले और शत्रुनाश करनेवाले तुम दोनों को (स्तौमि) सराहता हूँ और (जोहवीमि) बारंबार पुकारता हूँ। (तौ) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य सदाचारी और सत्यवादी होकर शत्रुओं को संग्राम में जीतें और परमेश्वर की उपासना करके सदा प्रसन्न रहें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(अधिब्रूतम्) अधिकमनुग्रहेण वदतम् (नः) अस्मभ्यम् (पृतनासु) संग्रामेषु (वज्रेण) (संसृतम्) संयोजयतम् (यः) पुरुषः (किमीदी) अ० १।७।१। किमिदानीं वर्तते किमिदं वर्तते-इत्येवमन्वेषणं कुर्वाणः। पिशुनः (स्तौमि) प्रशंसामि (भवाशर्वौ) सुखजनकशत्रुनाशकौ परमेश्वरगुणौ (नाथितः) अ० ४।२३।७। नाथवान्। अधीनः (जोहवीमि) पुनः पुनराह्वयामि। अन्यत् पूर्ववत् ॥