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यन्मेदम॑भि॒शोच॑ति॒ येन॑येन वा कृ॒तं पौरु॑षेया॒न्न दैवा॑त्। स्तौमि॒ द्यावा॑पृथि॒वी ना॑थि॒तो जो॑हवीमि॒ ते नो॑ मुञ्चत॒मंह॑सः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यत् । मा । इदम् । अभिऽशोचति । येनऽयेन । वा । कृतम् । पौरुषेयात् । न । दैवात् । स्तौमि । द्यावापृथिवी इति । नाथित: । जोहवीमि । ते इति । न: । मुञ्चतम् । अंहस: ॥२६.७॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:26» पर्यायः:0» मन्त्र:7


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

सूर्य और पृथिवी के गुणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (येनयेन) जिस किसी कारण से (पौरुषेयात्) पुरुष [इस शरीर] से किया हुआ (वा) अथवा (दैवात्) दैव [प्रारब्ध, पूर्वजन्म] के फल से प्राप्त हुआ (यत्) जो (इदम्) यह (कृतम्) कर्म (न) इस समय (मा) मुझ को (अभिशोचति) शोक में डालता है। [इसलिये] (नाथितः) मैं अधीन होकर (द्यावापृथिवी) सूर्य और पृथिवी को (स्तौमि) सराहता हूँ और (जोहवीमि) बारंबार पुकारता हूँ। (ते) वे तुम दोनों (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतम्) छुड़ावो ॥७॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पुरुषार्थ के साथ सुकर्म करके इस जन्म वा प्रारब्ध से प्राप्त हुए दुःख का नाश करके सूर्य पृथिवी आदि लोकों के उपयोग से सुख भोगें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(यत्) (मा) माम् (इदम्) इण् गतौ-दमुक्। पुरोवर्त्ति (अभिशोचति) अभितः सर्वतो दहति (येनयेन) येनकेन कारणेन (वा) अथवा (कृतम्) कर्म (पौरुषेयात्) पुरुषाद्बधविकारसमूहतेनकृतेषु। वा० पा० ५।१।१०। इति पुरुष-ढञ्। पुरुषकृतोत्कर्मणः (न) सम्प्रत्यर्थे-निरु० ७।३१। (दैवात्) अ० ४।१६।८। पूर्वजन्मार्जितात् कर्मणः (स्तौमि) प्रशंसामि (द्यावापृथिव्यौ) (नाथितः) अ० ४।२३।७। नाथवान्। अधीनः (जोहवीमि) पुनः पुनराह्वयामि। अन्यत् पूर्ववत् ॥