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येन॑ दे॒वा अ॒मृत॑म॒न्ववि॑न्द॒न्येनौष॑धी॒र्मधु॑मती॒रकृ॑ण्वन्। येन॑ दे॒वाः स्वराभ॑र॒न्त्स नो॑ मुञ्च॒त्वंह॑सः ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

येन । देवा: । अमृतम् । अनुऽअविन्दन् । येन । ओषधी: । मधुऽमती: । अकृण्वन् । येन । देवा: । स्व: । आऽअभरन् । स: । न: । मुञ्चतु । अंहस: ॥२३.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:23» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

कष्ट हटाने के लिये उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (येन) जिसके द्वारा (देवाः) विद्वान् देवताओं ने (अमृतम्) अमरपन [मृत्यु से छुटकारा अर्थात् मोक्ष वा कीर्ति] को (अनु-अविन्दन्) अनन्तर पाया है, और (येन) जिसके आश्रय से (ओषधीः) यव आदि पदार्थों को (मधुमतीः) मधुर रसवाली (अकृण्वन्) बनाया है, और (येन) जिसके द्वारा (देवाः) देवताओं ने (स्वः) स्वर्ग अर्थात् महा आनन्द (आ अभरन्) यथावत् धारण किया है, (सः) वह (नः) हमें (अंहसः) कष्ट से (मुञ्चतु) छुड़ावे ॥६॥
भावार्थभाषाः - जिस परमेश्वर की महिमा से महापुरुषों ने पुरुषार्थ करके अमरपन अर्थात् सुन्दर नाम प्राप्त किया है, और सांसारिक पदार्थों से विज्ञानपूर्वक उपकार लेकर अत्यन्त सुख पाया है, उसी जगदीश्वर के आश्रय से हम भी उद्योग करके दुःख से छूटें ॥६॥
टिप्पणी: ६−(येन) अग्निना परमेश्वरेण (देवाः) विद्वांसः (अमृतम्) अमरत्वम्। मोक्षम् (अनु-अविन्दन्) विद्लृ लाभे-लङ्। अनुक्रमेण अलभन्त (ओषधीः) व्रीहियवाद्यास्तरुगुल्माद्याश्च (मधुमतीः) मधुररसयुक्ताः (अकृण्वन्) अकुर्वन् (स्वः) स्वर्गं सुखम् (आ-अभरन्) डुभृञ् धारणपोषणयोः-लङ् सम्यग् अधारयन्। अलभन्तेत्यर्थः। अन्यत् पूर्ववत् ॥