0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जो [उपद्रवी] (अन्तरिक्षेण) मध्यवर्ती हृदय अवकाश द्वारा (पतति) नीचे गिरता है, (च) और (यः) जो (दिवम्) व्यवहार वा प्रकाश को (अतिसर्पति) लाँघकर रेंगता है, और (यः) जो (भूमिम्) अपनी सत्ता को [अहंकार से] (नाथम्) ईश्वर (मन्यते) मानता है, (तम्) उस (पिशाचम्) मांसभक्षक, दुःखदायक, आत्मा को (प्रदर्शय) तू दिखा दे ॥९॥
भावार्थभाषाः - जो मनुष्य मनोविकार से वेद मर्यादा छोड़ कुकर्मी बन जाता है, वह मनुष्य ईश्वरभक्ति से अपने अविद्यादि दोषों को छोड़कर सुखी होवे ॥९॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥ इति सप्तमः प्रपाठकः ॥
टिप्पणी: ९−(यः) आत्मदोषः। उपद्रवी जनो वा (अन्तरिक्षेण) मध्यवर्त्तिना हृदयावकाशेन, तत्सहायेन (पतति) अधोगच्छति (दिवम्) इगुपधज्ञा०। पा० ३।१।१३५। इति दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारादिषु-क प्रत्ययः। व्यवहारम्। प्रकाशम् (यः) (च) (अतिसर्पति) (अतीत्य, उल्लङ्ध्य गच्छति (भूमिम्) अ० १।११।२। भू सत्तायाम्-मि। सत्ताम् (यः) (मन्यते) अहंकारेण जानाति (नाथम्) नाथ याच्ञोपतापैश्वर्याशीःषु-अच्। प्रभुम्। ईश्वरम् (तम्) (पिशाचम्) पिशिताशिनम्। दुःखदायकमात्मानम् (प्रदर्शय) अवगमय ॥
