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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] तू (कश्यपस्य) रस पीनेवाले सूर्य का (च) और (चतुरक्ष्याः) पूर्वादि चार प्रकार से व्याप्तिवाली (शुन्याः) बढ़ी हुई दिशा का (चक्षुः) देखनेवाला ब्रह्म (असि) है। (पिशाचम्) मांस खानेवाले [पीड़ादायक] विघ्न को (मा तिरस्करः) गुप्त मत रख [प्रकाश करदे], (वीध्रे) विशेष चमकने के समय अर्थात् मध्याह्न में (सर्पन्तम्) चलते हुए (सूर्यमिव) सूर्य को जैसे [नहीं छिपा सकते] ॥७॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा इस सब विशाल संसार को सर्वथा देखता है और सबके दोषों को इस प्रकार जानता है, जैसे दोषहर के सूर्य को। इससे सब मनुष्य दोषों को त्याग कर सदा सुख से रहें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(कश्यपस्य) अ० २।३७।७। कश्यं जलरसं पिबतीति, तस्य, सूर्यस्य (चक्षुः) दर्शकं ब्रह्म (असि) (शुन्याः) श्वन्नुक्षन्पूषन्०। उ० १।१५९। इति टुओश्वि गतिवृद्ध्योः-कनिन्, नान्तत्वात् ङीप्। व्याप्तायाः प्रवृद्धाया दिशायाः (चतुरक्ष्याः) चतुर्+अक्षू व्याप्तौ-इन-ङीप्। पूर्वादिदिग्रूपेण चतुर्विधानि अक्षीणि व्यापनानि यस्याः सा चतुरक्षी तस्याः। चतुर्विधव्यापनशीलायाः (वीध्रे) वाविन्धेः। उ० २।२६। इति वि+इन्धी दीप्तौ-क्रन्। विशेषदीप्तिकाले। (मध्याह्ने) (सूर्यमिव) (सर्पन्तम्) गच्छन्तम् (पिशाचम्) पिशितभक्षकं विघ्नम् (मा तिरस्करः) करोतेर्माङि लुङि। कृमृदृरुहिभ्यश्छन्दसि। पा० ३।१।५९। इति च्लेः अङ् आदेशः। अन्तर्हितं मा कार्षीः। सर्वथा प्रकाशय-इत्यर्थः ॥
