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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे परमात्मन् !] (यातुधानान्) यातना देनेवाले दोषों को (मा) मुझे (दर्शय) दिखा, (यातुधान्यः=०-नीः) महापीड़ा देनेवाली कुवासनाओं को (दर्शय) दिखा। (सर्वान्) सब (पिशाचान्) मांस खानेवाले विघ्नों को (दर्शय) दिखा, (ओषधे) हे तापनाशक परमेश्वर ! (इति) इसके लिये (त्वा) तेरा (आरभे) मैं सहारा लेता हूँ ॥६॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य की बाहिरी कुचेष्टाएँ और भीतरी कुवासनाएँ उसकी उन्नति के महाविघ्न हैं, इसलिये वह विवेकपूर्वक उनका संशोधन करे ॥६॥
टिप्पणी: ६−(दर्शय) आविष्कारय, प्रकाशय (मा) माम् (यातुधानान्) पीडाप्रदान् दोषान् (यातुधान्यः) धातुधानीः। पीडाप्रदायिकाः कुवासनाः (सर्वान्) (पिशाचान्) अ० १।१६।३। पिशितस्य मांसस्य भक्षकान् महादुःखदायिनो विघ्नान् (इति) एवमर्थम् (त्वा) त्वां परमात्मानम् (आरभे) आलभे। स्पृशामि। धारयामि ॥
