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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्म की उपासना का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (रूपाणि) [पदार्थों के] रूपों अर्थात् बाहिरी आकार को (आविष्कृणुष्व) प्रकट करदे, (आत्मानम्) [वस्तुओं के] आत्मा अर्थात् भीतरी स्वभाव को (मा अप गूहथाः) गुप्त मत रख (अथो) और भी (सहस्रचक्षो) हे असंख्य दर्शन शक्तिवाले परमात्मन् ! (त्वम्) तू (किमीदिनः) अब क्या, वह क्या हो रहा है, ऐसे गुप्त कर्म करनेवाले लुतरे लोगों को (प्रति) अत्यक्ष (पश्याः) देखले ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पदार्थों के आकार और गुण को स्थूल और सूक्ष्म रीति से पहिचानकर दोषों से बचें और दूसरों को बचावें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(आविष्कृणुष्व) प्रकटीकुरु। प्रकाशय (रूपाणि) खष्पशिल्पशष्प०। उ० ३।२८। इति रु शब्दे-प प्रत्ययः, दीर्घश्च। यद्वा, रूप रूपस्य दर्शने करणे वा-अच्। पदार्थानां बाह्याकारान् (मा अप गूहथाः) गुहू संवरणे। संवृतम् आच्छादितं मा कार्षीः (आत्मानम्) अ० १।१८।३। पदार्थानां सूक्ष्मस्वभावं सारं तत्त्वं वा (अथो) अपि च (सहस्रचक्षो) भृमृशीङ्०। उ० १।७। इति चक्षिङ् कथने दर्शने च-ड। हे बहुदर्शनशक्ते परमात्मन् (त्वम्)। (प्रति) प्रत्यक्षम् (पश्य) दृशेर्लेटि आडागमः। अवलोकय (किमीदिनः) अ० १।७।१। किमिदानीं वर्तते किमिदं वर्तते-इत्येवमन्वेषमाणान् पिशुनान् राक्षसान् ॥
