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यस्य॒ विश्वे॑ हि॒मव॑न्तो महि॒त्वा स॑मु॒द्रे यस्य॑ र॒सामिदा॒हुः। इ॒माश्च॑ प्र॒दिशो॒ यस्य॑ बा॒हू कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यस्य । विश्वे । हिमऽवन्त: । महिऽत्वा । समुद्रे । यस्य । रसाम् । इत् । आहु: । इमा: । च । प्रऽदिश: । यस्य । बाहू इति । कस्मै । देवाय । हविषा । विधेम ॥२.५॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:2» पर्यायः:0» मन्त्र:5


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

ब्रह्म विद्या का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिसकी (महित्वा=०-त्वेन) महिमा से (विश्वे) सब (हिमवन्तः) हिमवाले पहाड़ हैं, और (यस्य) जिसकी [महिमा से] (समुद्रे) समुद्र [अन्तरिक्ष, वा पार्थिव समुद्र] में (रसाम्) नदी को (इत्) भी (आहुः) बताते हैं। (च) और (इमाः) यह (प्रदिशः) बड़ी दिशाएँ (यस्य) जिसकी (बाहू) दो भुजाएँ हैं, उस (कस्मै) सुखदायक प्रजापति परमेश्वर की (देवाय) दिव्य गुण के लिये (हविषा) भक्ति के साथ (विधेम) हम सेवा किया करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - जैसे मनुष्य अपनी दो भुजाओं के बल से अर्थात् शारीरिक और आत्मिक सामर्थ्य से प्रजापालन आदि बड़े बड़े बोझ उठाते हैं, उसी प्रकार परमेश्वर ने दिशाओं अर्थात् अवकाश के भीतर सब लोकों को रचकर परस्पर आकर्षण द्वारा स्थापित किया है, उस जगदीश्वर की आज्ञा में चलकर हम यत्न से उत्तम गुण प्राप्त करें ॥५॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० १०।१२१।४ और यजु० २५।१२ में है ॥
टिप्पणी: ५−(यस्य) कस्य। ईश्वरस्य (विश्वे) सर्वे। (हिमवन्तः) भूम्नि मतुप्, मस्य वः। बहुहिमयुक्ता महागिरयः (महित्वा) म० २। महित्वे (समुद्रे) अ० १।३।८। अन्तरिक्षे। पार्थिवसागरे (रसाम्) नन्दिग्रहि०। पा० ३।१।१३४। इति रस शब्दे-पचाद्यच्। यद्वा। रस उदकम्-निघ० १।१२। रसोऽस्त्यस्यामिति रसा। अर्शआदिभ्योऽच्। पा० ५।२।१२७। इति रस-अच्। रसा नदी भवति रसतेः शब्दकर्मणः-निरु० ११।२५। नदीम्। जलधाराम् (इत्) एव (आहुः) ब्रुवन्ति (इमाः) दृश्यमानाः (प्रदिशः) प्रकृष्टा दिशाः (बाहू) अ० २।२७।३। भुजद्वयवद् वर्तमानाः। अन्यद् गतम्-म० १ ॥