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अस॒द्भूम्याः॒ सम॑भव॒त्तद्यामे॑ति म॒हद्व्यचः॑। तद्वै ततो॑ विधूपा॒यत्प्र॒त्यक्क॒र्तार॑मृच्छतु ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

असत् । भूम्या: । सम् । अभवत् । तत् । याम् । एति । महत् । व्यच: । तत् । वै । तत: । विऽधूपायत् । प्रत्यक् । कर्तारम् । ऋच्छतु ॥१९.६॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:6


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के धर्म का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (तत्) यह (महत्) बड़ा (व्यचः) परस्पर मिला हुआ वा फैला हुआ (असत्) अनित्य जगत् (भूम्याः) भूमि से (समभवत्) उत्पन्न हुआ है, [जो जगत्] (याम्) जिस [भूमि] को (एति) चला जाता है। (ततः) उसी कारण से (तत्) वह [दुष्ट कर्म] (वै) अवश्य (प्रत्यक्) लौटकर (कर्तारम्) हिंसक को (विधूपायत्) संताप देता हुआ [उसको ही ऋच्छतु] पहुँचे ॥६॥
भावार्थभाषाः - जैसे ईश्वरनियम से कार्यरूप स्थूल पदार्थ भूमि आदि तत्त्वों से उत्पन्न होकर फिर छिन्न-भिन्न होकर भूमि आदि अपने कारणों में लौट जाते हैं, ऐसे ही राजा के दण्ड से दुष्ट की दुष्टता उसी को ही लौटती और सताती है ॥६॥ बम्बई गवर्नमेन्ट पुस्तक में टिप्पणी है कि जर्मनी के भट्ट रोथ और ह्विटनी महाशय के मत में (याम्) के स्थान पर [द्याम्] होना चाहिये और ग्रिफ़िथ महाशय ने भी [द्याम्] मान कर स्वर्ग [heaven] अनुवाद किया है, परन्तु पदपाठ और सायणभाष्य में (याम्) है, और हमारे मत में भी (याम्) ही शुद्ध है ॥
टिप्पणी: ६−(असत्) सत् नित्यम् असत् अनित्यं नश्वरं कार्यरूपं जगत् (भूम्याः) भूमिसकाशात् (समभवत्) उदपद्यत (तत्) असद् यत् (याम्) भूमिम् (एति) प्राप्नोति प्रति निवृत्य (महत्) विशालम् (व्यचः) व्यच छले। सम्बन्धे-असुन्। सम्बद्धं व्याप्तम् (तत्) शत्रुकृतं कर्म (वै) अवश्यम् (ततः) तस्मात् कारणात् (विधूपायत्) धूप संतापे। गुपूधूपविच्छि०। पा० ३।१।२८। इति आयप्रत्ययः स्वार्थे, ततः शतृ। संतापयत् शत्रुम् (प्रत्यक्) प्रति-निवृत्य (कर्तारम्) कृञ् हिंसायाम्-तृच्। हिंसकम् (ऋच्छतु) गच्छतु ॥