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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] (विभिन्दती) रोगों को छिन्न-भिन्न करनेवाली (शतशाखा) सैकड़ों शाखावाली [ओषधि के समान] (विभिन्दन्) शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करनेवाला (नाम) प्रसिद्ध (ते) तेरा (पिता) पिता है। (त्वम्) तू भी (प्रत्यक्) लौटाकर (तम्) उसको (वि भिन्धि) छिन्न-भिन्न करदे, (यः) जो (अस्मान्) हमको (अभिदासति) सताता रहता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - शूरवीर पिता का पुत्र भी अपने पिता के तुल्य शूरवीर होकर वैरियों का नाश करता है ॥५॥
टिप्पणी: ५−(विभिन्दती) भिदिर् विदारणे-शतृ। रोदविदारणशीला (शतशाखा) बहुशाखायुक्ता यथौषधिः (विभिन्दन्) शत्रूणां विभेदकः। विदारणशक्तिः (नाम) प्रसिद्धः (ते) तव (पिता) पालकः। जनकः (प्रत्यक्) प्रतिगमनेन प्रतिनिवार्य (वि भिन्धि) विदारय (त्वम्) हे राजन् (तम्) अस्मदीयं शत्रुम् (यः) शत्रुः (अस्मान्) धार्मिकान् (अभिदासति) दास वधे−वैदिकः। अभितो हिनस्ति ॥
