ब्रा॑ह्म॒णेन॒ पर्यु॑क्तासि॒ कण्वे॑न नार्ष॒देन॑। सेने॑वैषि॒ त्विषी॑मती॒ न तत्र॑ भ॒यम॑स्ति॒ यत्र॑ प्रा॒प्नोष्यो॑षधे ॥
पद पाठ
ब्राह्मणेन । परिऽउक्ता । असि । कण्वेन । नार्षदेन । सेनाऽइव । एषि । त्विषिऽमती । न । तत्र । भयम् । अस्ति । यत्र । प्रऽआप्नोषि । ओषधे ॥१९.२॥
अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:19» पर्यायः:0» मन्त्र:2
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे राजन् !] तू (ब्राह्मणेन) वेदज्ञानी ब्राह्मण, (कण्वेन) मेधावी, (नार्षदेन) नायकों की सभा के हितकारी पुरुष करके (पर्युक्ता) उपदिष्ट [ओषधसमान] (असि) है। (त्विषीमती) प्रकाशयुक्त (सेना) सेना, अर्थात् सूर्य की किरणपुञ्ज के (इव) समान (एषि) तू चलता है। (तत्र) वहाँ पर (भयम्) भय (न अस्ति) नहीं होता, (यत्र) जहाँ पर (ओषधे) हे ओषधितुल्य तापनाशक राजन् (व्याप्नोषि) तू व्यापक होता है ॥२॥
भावार्थभाषाः - जैसे सद्वैद्य की बतलाई ओषधि बड़ी गुणकारी होती है और जैसे सूर्य अपनी किरणों से अन्धकार मिटाता है, वैसे ही राजा वेदज्ञानी, बुद्धिमान् नरशिरोमणि पुरुषों के उपदेशक और सत्सङ्ग से प्रतापी होकर शत्रुओंका नाश करके प्रजा को सुख देता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(ब्राह्मणेन) वेदज्ञेन विदुषा (पर्युक्ता) उपदिष्टौषधिवत् (असि) (कण्वेन) अ० २।३२।३। उपदेशकेन। मेधाविना-निघ० ३।१५। (नार्षदेन) नरो नायकाः सीदन्ति यत्रेति नृषत्। तस्मै हितम्। पा० ५।१।५। इति नृषद् अण्। नृणां नायकानां सभाया हितकारकेण (सेनाइव) यथा सेना सूर्यकिरण-समूहः (एषि) गच्छसि (त्विषीमती) इगुपधात् कित्। उ० ४।१२०। इति त्विष दीप्तौ-इन् स च कित् ङीप्। दीप्तियुक्ता (न) (तत्र) (भयम्) भीतिः दरः (अस्ति) (यत्र) (प्राप्नोषि) व्याप्नोषि (ओषधे) हे ओषधिवत् तापनाशक राजन् ॥
