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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यातुधानान्) पीड़ा देनेवाले राक्षसों को (अपमृज्य) शोधकर, और (सर्वाः) सब प्रकार की (अराय्यः) दरिद्रताओं को (अप=अपमृज्य) शोधकर, (अपमार्ग) हे सर्वसंशोधक राजन् ! (त्वया) तेरे साथ (वयम्) हम लोग (तत् सर्वम्) उस सब [कष्ट कर्म] को (अपमृज्महे) शोधते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - नीतिनिपुण राजा के शासन में सब प्रजागण अपने कष्टों को दूर करके आनन्द भोगते हैं ॥८॥ इस मन्त्र का उत्तरार्ध सूक्त १७ मन्त्र ६ में आया है ॥
टिप्पणी: ८−(अपमृज्य) सम्यक् शोधयित्वा (यातुधानान्) अ० १।७।१। पीडाप्रदान् राक्षसान् (अप) अपमृज्य (सर्वाः) (अराय्यः) म० ७। अरायीन् अलक्ष्मीः। अन्यद् व्याख्यातं सू० १७ म० ६ ॥
