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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अपामार्गः) दोषों का शोधनेवाला राजा (क्षेत्रियम्) देह वा वंश के दोष को, (च) और (यः) जो कुछ (शपथः) दुर्वचन हो [उसे भी] (अप मार्ष्टु) शुद्ध कर देवे। (अह) अरे (यातुधानीः) यातना देनेवाली शत्रुसेनाओं को (अप=अप मार्ष्टु) शुद्ध कर डाले, और (सर्वाः) सब (अराय्यः=अरायीः) अलक्ष्मियों को (अप=अप मार्ष्टु) शुद्ध कर डाले ॥७॥
भावार्थभाषाः - राजा अपनी सुनीति से प्रजा के दुःखों का नाश करके उनके स्वास्थ्य और धन की वृद्धि करे ॥७॥
टिप्पणी: ७−(अपामार्गः) अ० ४।१७।६। सर्वथा शोधको राजा (अप मार्ष्टु) मृजूष् शुद्धौ। शोधयतु। अपगमयतु (क्षेत्रियम्) अ० २।८।१। क्षेत्र−घच्। देहे वंशे वा भवं रोगं दोषं वा (शपथः) क्रोशः। दुर्वचनम् (च) (यः) यः, तमपि (अप) अप मार्ष्टु (अह) विनिग्रहे (यातुधानीः) अ० १।२८।२। पीडादायिनीः शत्रुसेनाः (सर्वाः) (अराय्यः) अ० ४।१७५। अलक्ष्मीः ॥
