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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः) जिस दुष्ट ने (कर्तुम्) हिंसा को (चकार) किया था, वह (न शशाक) समर्थ न था, उसने (पादम्) अपना पैर और (अङ्गुरिम्) अङ्गुरी (शश्रे) तोड़ली। (सः) उसने (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (भद्रम्) आनन्द, और (आत्मने) अपने लिये (तु) तो (तपनम्) तपन (चकार) कर लिया ॥६॥
भावार्थभाषाः - पापी का आत्मा दुर्बल होता है, वह दण्ड पाने से आप ही अपने हाथ पैर में कुल्हाड़ी मारता है। उससे शिष्टों को सुख और उस दुष्ट को दुःख होता है ॥६॥
टिप्पणी: ६−(यः) दुष्टपुरुषः (चकार) कृतवान् (न) नहि (शशाक) शक्तः समर्थ आसीत् (कर्तुम्) सितनिगमि०। उ० ३।६९। इति कृञ् हिंसायाम्−तुन्। हिसाम् (शश्रे) शॄ हिंसायाम्-लिट्। शीर्णवान्। छिन्नवान् (पादम्) चरणम् (अङ्गुरिम्) अ० २।३३।६। अङ्गुलिम् (भद्रम्) मङ्गलम् (अस्मभ्यम्) प्रजागणेभ्यः (आत्मने) स्वस्मै (तपनम्) दहनं पीडनम् (तु) किन्तु (सः) दुष्कर्मी ॥
