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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के धर्म का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) हे विद्वानों ! (यः) जो पुरुष (कृत्याम्) हिंसा (कृत्वा) करके (अविदुषः) अजान मनुष्य के (गृहम्) घर को (हरात्) हर लेवे। वह दुष्कर्म (प्रत्यक्) लौट कर (तम्) उसी [दुष्कर्मी] को (उप पद्यताम्) जा मिले, (इव) जैसे (धारुः) दूध पीनेवाला (वत्सः) बछड़ा (मातरम्) अपने माता [गौ के पीछे-पीछे दौड़ता है] ॥२॥
भावार्थभाषाः - दुष्ट मनुष्य को उसकी दुष्टता का दण्ड राजप्रबन्ध वा ईश्वरव्यवस्था से अवश्य पहुँचता है, जैसे छोटा बछड़ा अनेक गौओं में से अपनी ही माता को चिपट जाता है ॥२॥
टिप्पणी: २−(यः) शत्रुः (देवाः) हे विद्वांसः (कृत्याम्) हिंसाम् (कृत्वा) विधाय (हरात्) लेटि आडागमः। हरेत् (अविदुषः) अजानानस्य (गृहम्) गेहम् (वत्सः) वदनशीलः। गोशिशुः (धारुः) दाधेट्सिशदसदो रुः। पा० ३।२।१५९। इति धेट् पाने-रु। स्तनपानकर्ता (इव) यथा (मातरम्) जननीम् (तम्) दुष्टम् (प्रत्यक्) प्रतिनिवृत्य (उप पद्यताम्) उप गच्छतु ॥
