0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
राजा के लक्षणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (क्षुधामारम्) भूख से मरना, (तृष्णामारम्) पियास से मरना, (अगोताम्) गौओं की हानि, और (अनपत्यताम्) बच्चों का अभाव, (तत् सर्वम्) इस सबको, (अपामार्ग) हे सर्वसंशोधक ! [वा अपामार्ग औषध के समान उपकारी राजन् !] (त्वया) तेरे साथ (वयम्) हम (अप मृज्महे) शोधते हैं ॥६॥
भावार्थभाषाः - राजा के सुप्रबन्ध से सूखा के समय भी अन्न, जल, गौ, बैल आदि की बहुतायत से मनुष्य यथावत् बढ़ते रहते हैं ॥६॥ (अपामार्ग) का अर्थ सर्वथा संशोधक है, और एक औषध भी है, जिससे कफ, बवासीर, खुजली, उदररोग और विषरोग का नाश होता है ॥६॥
टिप्पणी: ६−(क्षुधामारम्) मृञ्-घञ्। क्षुत्पीडया मरणम् (तृष्णामारम्) पिपासया मरणम् (अगोताम्) गवाम् अभावम् (अनपत्यताम्) अपत्यानां राहित्यम् (अपामार्ग) अप+आङ्+मृजू शौचालंकारयोः-घञ्। हे सर्वथा संशोधक। हे अपामार्गौषधवद् उपकारिन् ! अपामार्गपर्य्यायः-अपामार्गः शैखरिको धामार्गावमयूरकौ-इत्यमरः, १४।८८। अस्य गणाः। कफार्शः कण्डूदरामयविसषरोगनाशित्वम्-इति शब्दकल्पद्रुमः (त्वया) राज्ञा (वयम्) प्रजागणाः (सर्वम्) (तत्) एतत् [अपमृज्महे] अपमार्जयामः शोधयामः विनाशयामः-इत्यर्थः ॥
