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या श॒शाप॒ शप॑नेन॒ याघं मूर॑माद॒धे। या रस॑स्य॒ हर॑णाय जा॒तमा॑रे॒भे तो॒कम॑त्तु॒ सा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

या । शशाप । शपनेन । या । अघम् । मूरम् । आऽदधे ।या । रसस्य । हरणाय । जातम् । आऽरेभे । तोकम् । अत्तु । सा ॥१७.३॥

अथर्ववेद » काण्ड:4» सूक्त:17» पर्यायः:0» मन्त्र:3


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

राजा के लक्षणों का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (या) जिस [शत्रुसेना] ने (शपनेन) शाप [कुवचन] से (शशाप) कोसा है और (या) जिसने (अवम्) दुःख देनेवाली (मूरम्) मूल को (आदधे) जमा लिया है। और (या) जिसने (रसस्य) रस के (हरणाय) हरण के लिये [हमारे] समूह को (आरेभे) छूआ है, (सा) यह [शत्रुसेना] (तोकम्) अपनी बढ़ती वा संतान को (अत्तु) खा लेवे ॥३॥
भावार्थभाषाः - जल शत्रु सेना दुर्वचन बोलती और उपद्रव मचाती बढ़ती आवे, युद्धकुशल सेनापति उनमें भेद डाल दे कि वह लोग अपने संतान अर्थात् इष्ट मित्रों को ही नाश करदें ॥३॥ यह मन्त्र पहले आ चुका है-अ० १।२८।३ ॥
टिप्पणी: ३-अयं मन्त्रो व्याख्यातः-अ० १।२८।३। इह शब्दार्थो दीयते। (या) शत्रुसेना (शशाप) अनिष्टकथनं कृतवती। (शपनेन) शापेन कुवचनेन (अघम्) दुःखकरम् (मूरम्) लस्य रः। मूलं प्रतिष्ठाम् (आदधे) परिजग्राह (रसस्य) सारस्य। आनन्दस्य (हरणाय) नाशनाय (आरेभे) आलेभे। स्पृष्टवती (तोकम्) वर्धनम्। सन्तानम् (अत्त) भक्षयतु (सा) शत्रुसेना ॥