पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
वृष्टि की प्रार्थना और गुणों का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (खण्वखा ३ इ=खण्वाखे) हे खनती में लंगड़ानेवाली (खैमखा ३ इ=खैमखे) हे कष्ट में ठहरी हुई (तदुरि=दर्दुरि) हे [भूमि वा कान] फोड़नेवाली दादुरी ! (मध्ये) [जल के] भीतर वर्तमान ! और (पितरः) हे पालन करनेवाले विद्वान् किसान आदि लोगो ! (वर्षम्) वर्षा का (वनध्वम्) सेवन करो (मरुताम्) याजकों के (मनः) मन को (इच्छत) चाहो [प्रसन्न करो] ॥१५॥
भावार्थभाषाः - वृष्टि होने से अन्न आदि पदार्थों की उत्पत्ति से सब प्राणी मेंडुकी के समान प्रसन्न होते हैं और यज्ञादि उत्तम कर्मों में प्रवृत्त होते हैं ॥१५॥
टिप्पणी: १५−(खण्वखा ३ इ=खण्वखे) अशूप्रुषि०। उ० १।१५१। इति खनु अवदारणे-क्वन्। णत्वं छान्दसम्। खजि गतिवैकल्ये-ड। टाप्। एचोऽप्रगृह्यादूराद्धूते पूर्वस्यार्धस्यादुत्तरस्येदुतौ। पा० ८।२।१०७। इति एकारं विगृह्य अकारस्य प्लुतः। खण्वे खनने छिद्रे खञ्जति सा खण्वखा, तत्सम्बुद्धौ खण्वखे। हे विले पङ्गुगते ! (खैमखा ३ इ=खैमखे) अर्त्तिस्तुसुहु०। उ० १।१४०। इति खै स्थैर्ये, खनने, हिंसायां चेति शब्दकल्पद्रुमः-ततो मन् प्रत्ययः, स च णित्। पुनः खै-ड, टाप्। खैमे हिंसायां कष्टे खायति तिष्ठति सा खैमखा। हे कष्टस्थिते (तदुरि) म० १४। हे दर्दुरि ! मण्डूकि (वर्षम्) वृष्टिम् (वनुध्वम्) वन सम्भक्तौ। सेवध्वम् (पितरः) हे पालयितारो विद्वांसो यूयं च (मरुताम्) ऋत्विजाम्-निघ० ३।१८। दोषनाशकानां याजकानाम् (मनः) चित्तम् (इच्छत) कामयध्वम् ॥
