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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
स्वास्थ्यरक्षा का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (वात) हे वायु ! (भेषजम्) स्वास्थ्य को (आ वाहि) वह कर ला और, (वात) हे वायु (यत् रपः= यत् रपः तत्) जो दोष है उसे (विवाहि) बह कर निकाल दे (हि) क्योंकि (विश्वभेषज) हे सर्वरोगनाशक वायु ! (त्वम्) तू (देवानाम्) इन्द्रियों, विद्वानों और सूर्यादि लोकों के बीच (दूतः) चलनेवाला वा दूत [समान सन्देश पहुँचानेवाला] होकर (ईयसे) फिरता रहता है ॥३॥
भावार्थभाषाः - वायु के संचार से शरीर का मल निकल कर स्वास्थ्य मिलता है और तार, विमान, ताप, वृष्टि आदि का संचार होता है ॥३॥
टिप्पणी: ३−(वात) हे वायो ! (आ वाहि) आवह। आगमय (भेषजम्) तस्येदम्। पा० ४।३।१२०। इथि भिषज्-अण्। निपातनाद् गुणः। भिषजो वैद्यस्येदम्। स्वास्थ्यम्। (वि वाहि) विगमय। विनाशय (यत्) यत्किञ्चित् (रपः) पापम्। दोषः (हि) यस्मात् कारणात् (विश्वभेषज) भेषं भयं जयतीति। जि-ड। सर्वव्याधिनिवर्तक वायो ! (देवानाम्) इन्द्रियाणां विदुषां सूर्यादीनां च मध्ये (दूतः) दुतनिभ्यां दीर्घश्च। उ० ३।९०। इति दु गतौ उपतापे वा-कर्त्तरि क्त। गन्ता। यद्वा दूतवत्सन्देशहरः (ईयसे) ईङ् गतौ−श्यन्। संचरसि ॥
