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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अपने दोष मिटाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (ओषधे) हे तापनाशक ओषधि [के समान मनुष्य !] (लोम) रोम को (लोम्ना) रोम के साथ (संकल्पय) जमा दे, (त्वचम्) त्वचा को (त्वचा) त्वचा के साथ (संकल्पय) जोड़ दे, (ते) तेरा (असृक्) रुधिर और (अस्थि) हाड (रोहतु) उगे, (छिन्नम्) टूटा अङ्ग भी (संधेहि) अच्छे प्रकार मिलादे ॥५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य ईश्वरविचार से अपने दोषों की चिकत्सा करे जैसे वैद्य ओषधि से करते हैं ॥५॥
टिप्पणी: ५−(लोम) अ० ३।३३।७। देहजातं केशाकारं द्रव्यम्। रोम। (लोम्ना) रोम्णा (संकल्पय) संक्लृप्तं पुनः स्वस्थानगतं कुरु। संयोजय (त्वचा) चर्मणा (त्वचम्) चर्म (छिन्नम्) भिन्नमङ्गम् (सं धेहि) संहितं संश्लिष्टं व्यापारक्षमं कुरु। अन्यत् पूर्ववत् ॥
