0 बार पढ़ा गया
पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
अपने दोष मिटाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मानुषी प्रजा तू] (छिन्नस्य) टूटी (अस्थ्नः) हड्डी की (रोहणी) पूरनेवाली (रोहणी) रोहिणी वा लाक्षा [के समान] (रोहणी) पूरनेवाली शक्ति (असि) है। (अरुन्धति) हे रोक न डालनेवाली शक्ति तू ! (इदम्) ऐश्वर्य (रोहय) सम्पूर्ण कर ॥१॥
भावार्थभाषाः - बुद्धिमान् पुरुष विज्ञानपूर्वक अपने आत्मिक और शारीरिक दोषों को मिटावे, जैसे सद्वैद्य रोहिणी वा लाक्षा [लाख वा लाह] आदि ओषधि से रोगों को निवृत्त करता है ॥१॥ सायणभाष्य में (रोहणी) पद के स्थान में [रोहिणी] मानकरलाक्षा अर्थ किया है ॥
टिप्पणी: १−(रोहणी) रुह प्रादुर्भावे-णिच्-ल्युट्, ङीप्। रोहयित्री पूरयित्री शक्तिः। नित्यवीप्सयोः। पा० ८।१।४। इति द्विर्वचनम् (असि) भवसि (अस्थ्नः) अ० १।२३।४। मांसाभ्यन्तरस्थस्य धातुविशेषस्य (छिन्नस्य) भिन्नस्य (रोहणी) व्युत्पत्तिः पूर्ववत्। रोहणी एव रोहिणी, ओषधिविशेषः। तत्पर्यायाः शब्दकल्पद्रुमे। कटुम्भरा। सोमवल्कः। सोमवृक्षः। सायणमते तु रोहिणी लाक्षा नामौषधविशेषः (रोहय) प्ररोहय। पूरय (इदम्) इन्देः कमिन्नलोपश्च। उ० ४।१५७। इति इदि परमैश्वर्ये-कमिन्। परमैश्वर्यम् (अरुन्धति) नञ्+रुधिर् आवरणे-शतृ, ङीप्। हे अरोधनशीले ! हे अवारयित्रि शक्ते ॥
