ब्रह्मविद्या और पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अनड्वान्) प्राण वा जीविका पहुँचानेवाला परमेश्वर (सुकृतस्य) पुण्य के (लोके) स्थान में (दुहे= दुग्धे) पूर्ण करता है, (पवमानः) शुद्ध करनेवाला परमात्मा (पुरस्तात्) पहिले से ही (एनम्) इस [जीव] को (आ प्याययति) सब प्रकार बढ़ाता है। (अस्य) इस [परमेश्वर] की (धाराः) धारण शक्तियाँ (पर्जन्यः) मेघ [के समान] हैं, और (ऊधः) वहन वा ले चलने का सामर्थ्य (मरुतः) पवन [के समान] है, (अस्य) इसकी (यज्ञः) संगतिक्रिया (पयः) दूध [के समान] है, और (दक्षिणः) दानशक्ति (दोहः) दोहनी [के समान] है ॥४॥
भावार्थभाषाः - वह जगदीश्वर पुण्यात्माओं की इच्छा पूर्ण करता है, और सृष्टि की आदि में वेद देकर सबकी वृद्धि करता है और जैसे मेघ, वायु आदि पदार्थ उपकारी हैं, इसी प्रकार वह परमात्मा मेघ, पवन आदिकों का धारण करनेवाला आदिमूल है ॥४॥