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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
ब्रह्मविद्या और पुरुषार्थ का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - वह [परमेश्वर] (सायम्) सायंकाल में (परि) सब ओर से (दुहे=दुग्धे) पूर्ण करता है। (प्रातः) प्रातःकाल (दुहे) पूर्ण करता है। (मध्यंदिनं) मध्याह्न में (दुहे) पूर्ण करता है। (अस्य) सर्वव्यापक वा सर्वरक्षक विष्णु के (ये) जो (दोहाः) पूर्त्तिप्रवाह (संयन्ति) बटुरते रहते हैं (तान्) उनको (अनुपदस्वतः) अक्षय (विद्म) हम जानते हैं ॥१२॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर का सदा अक्षय भण्डार है, ऐसा जानकर मनुष्य विज्ञानपूर्वक आगे बढ़ता रहे ॥१२॥
टिप्पणी: १२−(दुहे) लोपस्त आत्मनेपदेषु। पा० ७।१।४१। इति तलोपः। दुग्धे प्रपूरयति अनड्वान् (सायम्) षो अन्तकर्मणि-णम्, युगागमः। दिनान्ते (प्रातः) प्राततेररन्। उ० ५।५९। इति प्र+अत सातत्यगमने-अरन्। प्रभातकाले (मध्यं दिनम्) राजदन्तादित्वात् मध्यशब्दस्य पूर्वत्वम्। पृषोदरादित्वात् नकारागमः। दिनस्य मध्यम्। मध्याह्नम् (परि) परितः। सर्वतः। (दोहाः) पूर्त्तिप्रवाहाः (अस्य) म० ८। सर्वव्यापकस्य सर्वरक्षकस्य वा विष्णोः परमेश्वरस्य (संयन्ति) इण् गतौ। संगच्छन्ते (तान्) दोहान् (विद्म) विदो लटो वा। पा० ३।४।८३, इति मसो मादेशो वा। विद्मः। जानीमः (अनुपदस्वतः) म० ९। क्षयरहितान् ॥
