पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विघ्नों के हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (दिवि) सूर्यमण्डल में (जातः) प्रकट, (समुद्रजः) अन्तरिक्ष में प्रकट, (सिन्धुतः) पार्थिव समुद्र से (परि) ऊपर (आभृतः) सर्वथा पुष्टि को प्राप्त, (सः) दुःखनाशक, (हिरण्यजाः) सूर्यादि तेजों का उत्पन्न करनेवाला, (शङ्खः) शान्तिकारक, (मणिः) प्रशंसायोग्य परमेश्वर (नः) हमारा (आयुष्प्रतरणः) जीवन बढ़ानेवाला है ॥४॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा सबके ऊपर, नीचे, मध्य में विराजमान होकर अपनी न्यायव्यवस्था से हमारे उत्तम कर्मों के अनुसार हमें उत्तम फल देता है ॥४॥
टिप्पणी: ४−(दिवि) द्युलोके। सूर्यमण्डले (जातः) प्रादुर्भूतः। वर्तमानः (समुद्रजः) सप्तम्यां जनेर्डः। पा० ३।२।९७। इति ड प्रत्ययः। अन्तरिक्षे प्रत्यक्षः (सिन्धुतः) पार्थिवजलौघात् (परि) म० १। अधि। उपरि (आभृतः) समन्तात् पुष्टिं प्राप्तः (सः) म० १। दुःखनाशक ईश्वरः (नः) अस्माकम्। अस्मभ्यम् (हिरण्यजाः) म० १। तेजसां जनयिता (शङ्खः) म० १। शान्तिकारकः (आयुष्प्रतरणः) आयुषो जीवनस्य प्रवर्धयिता (मणिः) अ० १।२९।१। रत्नम्। प्रशंसनीयः परमेश्वरः ॥
