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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विघ्नों के हटाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (यः= यः त्वम्) जो तू (रोचनानाम्) प्रकाशमान लोकों के (अग्रतः) आगे और (समुद्रात्) जलसमूह समुद्र से भी (अधि) ऊपर [देश और काल में] (जज्ञिषे) प्रकट हुआ था, [उस तुझ] (शङ्खेन) सबों के विवेचन करनेवाले, वा देखनेवाले, वा शान्ति देनेवाले, परमेश्वर [के आश्रय] से (रक्षांसि) जिन से रक्षा की जावे उन राक्षसों को (हत्वा) मारकर (अत्रिणः) पेटार्थियों को (वि) विविध प्रकार से (सहामहे) हम दबाते हैं ॥२॥
भावार्थभाषाः - सर्वदा सर्वोपरि विराजमान परमेश्वर की महिमा और उपकारों को विचारकर, हम लोग कुव्यवहार से बचकर पुरुषार्थ के साथ आनन्द भोगें ॥२॥
टिप्पणी: २−(यः) हे शङ्ख यस्त्वम् (अग्रतः) अग्रे। आदौ (रोचनानाम्) अनुदात्तेतश्च हलादेः। पा० ३।२।१४९। इति रुच दीप्तौ-युच्। प्रकाशमानानां नक्षत्रादीनाम् (समुद्रात्) जलसमूहात् (अधि) उपरि देशे काले च (जज्ञिषे) जनी-लिट्। त्वं प्रादुर्बभूविथ (शङ्खेन) म० १। सर्वेषां विवेचकेन दर्शकेन शान्तिदायकेन वा परमेश्वरेण (हत्वा) नाशयित्वा (रक्षांसि) अ० १।२१।३। राक्षसान्। शत्रून् (अत्रिणः) अ० १।७।३। अद भक्षणे-त्रिनि। भक्षणशीलान्। उदरपोषकान् (वि) विशेषेण (सहामहे) अभिभवामः ॥
