सृष्टि विद्या से ब्रह्म का विचार।
पदार्थान्वयभाषाः - (सः) ईश्वर (जनुषः) उत्पन्न जगत् के (बुध्न्यात्) मूल देश से लेकर (अग्रम् अभि) उपरि भाग तक (आष्ट्र=आष्ट) व्याप्त हुआ। (बृहस्पतिः) बड़े बड़ों का स्वामी (देवता) प्रकाशमान परमेश्वर (तस्य) उस [जगत्] का (सम्राट्) सम्राट् [राजराजेश्वर] है। (यत्) क्योंकि (ज्योतिषः) ज्योतिःस्वरूप परमेश्वर से (शुक्रम्) चमचमाता हुआ (अहः) दिन [सूर्य] (जनिष्ट=अजनिष्ट) उत्पन्न हुआ, (अथ) तभी (विप्राः) इन्द्रियाँ वा बुद्धिमान् लोग (द्युमन्तः) प्रकाशमान् होकर (वि) विविध प्रकार से (वसन्तु) निवास करें ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमेश्वर इस सब जगत् के आदि अन्त में विराजमान है, वही सार्वभौम शासक है, उसीने सूर्य को बनाया है जिससे इन्द्रियाँ प्रकाश पाकर अपना व्यापार करती हैं। उसीसे पंडित जन विद्या प्रकाश करके कीर्त्तिमान होते हैं ॥५॥ पं० सेवकलाल कृष्णदास की संहिता और सायणभाष्य में (आष्ट्र) के स्थान में [आष्ट] है ॥