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येना॑ श्रवस्यव॒श्चर॑थ दे॒वा इ॑वासुरमा॒यया॑। शुनां॑ क॒पिरि॑व॒ दूष॑णो॒ बन्धु॑रा काब॒वस्य॑ च ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

येन । श्रवस्यव: । चरथ । देवा:ऽइव । असुरऽमायया । शुनाम् । कपि:ऽइव । दूषण: । बन्धुरा । काबवस्य । च ॥९.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:9» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

विघ्न की शान्ति के लिए उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (येन) जिस [बल] के साथ (श्रवस्यवः) हे प्रसिद्ध महापुरुषों ! (देवाः इव) विजयी लोगों के समान (असुरमायया) प्रकाशमान ईश्वर की बुद्धि से (चरथ) तुम आचरण करते हो, [उसी बल के साथ] (शुनाम्) कुत्तों के (दूषणः) तुच्छ जाननेवाले (कपिः इव) बन्दर के समान (बन्धुरा) बन्धनशक्ति [नीतिविद्या] (च) निश्चय करके (काबवस्य) स्तुतिनाशक शत्रु की [तुच्छ करनेवाली होती है] ॥४॥
भावार्थभाषाः - शास्त्रबल से प्रसिद्ध पुरुष अन्य महात्माओं का अनुकरण करके तीव्र बुद्धि के साथ उदाहरण बनते हैं, इसी प्रकार सब पुरुष नीतिबल से शत्रुओं पर प्रबल रहें, जैसे बन्दर वृक्ष पर चढ़कर कुत्तों से निर्भय रहता है ॥४॥
टिप्पणी: ४− (येन)। शास्त्रबलेन। (श्रवस्यवः)। म० ३। प्रसिद्धाः। महान्तः कीर्तिमन्तः। (चरथ)। आचरणं कुरुथ। (देवाः इव)। विजयिनो पथा। (असुरमायया)। असुर इति व्याख्यातम्-अ० १।१०।१। असेरुरन् उ० १।४२। इति असु क्षेपणे, यद्वा, अस गतिदीप्त्यादानेषु-उरन्। माछाशसिभ्यो यः। उ० ४।१०९। इति माङ् माने-य, टाप्। माया प्रज्ञानाम-निघ० ३।९। असुरस्य प्रकाशमानस्य परमेश्वरस्य मायया प्रज्ञया सह। (शुनाम्)। श्वन्नुक्षन्पूषन्। उ० १।१५९। इति श्वि गतौ वृद्धौ च-कनिन्। कुक्कुराणाम्। (कपिः)। कुण्ठिकम्पयोर्नलोपश्च। उ० ४।१४४। इति कपि चलने-इप्रत्ययः। वानरः। (इव)। यथा। (दूषणः)। नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणिन्यचः। पा० ३।१।१३४। इति दुष वैकृत्ये, णिच्-ल्यु। दूषयतीति यः। दूषकः। दोषोत्पादकः। (बन्धुरः)। म० ३। बन्ध-उरच्, टाप्। बध्यतेऽनया। बन्धनशीला। नीतिविद्या। (काबवस्य)। म० ३। स्तुतिनाशकस्य शत्रोः। दूषयित्री भवतीति शेषः। (च)। अवधारणे ॥