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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
विघ्न की शान्ति के लिए उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अश्रेष्माणः) दाह [डाह] न करनेवाले पुरुषों ने [जगत् को] (अधारयन्) धारण किया है, (तथा) उसी प्रकार से ही (तत्) वह [जगत् का धारण] (मनुना) सर्वज्ञ परमेश्वर करके (कृतम्) किया गया है। (विष्कन्धम्) विघ्न को (वध्रि) निर्बल (कृणोमि) मैं करता हूँ, (गवाम् इव) जैसे बैलों के (मुष्काबर्हः) अण्डकोष तोड़नेवाला [बैलों को निर्बल कर देता है] ॥२॥
भावार्थभाषाः - पक्षपातरहित परमेश्वर संसार का धारण-पोषण करता है, उसी प्रकार धर्मात्मा पुरुष किसी से वैर न करके उपकार करते आये हैं, वैसे ही प्रत्येक मनुष्य विघ्नों को हटाकर उन्नति करे, जैसे दुर्दमनीय बैल को असह्यबल से हीन करके कृषि आदि में चलाते हैं ॥२॥
टिप्पणी: २−(अश्रेष्माणः)। सर्वधातुभ्यो मनिन्। उ० ४।१४५। इति श्रिवु दाहे-मनिन्। दाहशून्याः। अमत्सराः। (अधारयन्)। धृतवन्तः। (तथा)। तद्वदेव। (तत्)। धारणरूपं कर्म। (मनुना)। शॄस्वृस्निहि०। उ० १।१०। इति मन बोधे-उ। सर्वज्ञेन परमेश्वरेण। (कृतम्)। अनुष्ठितम्। (कृणोमि)। करोमि। (वध्रि)। अदिशदिभूशुभिभ्यः क्रिन्। उ० ४।६५। इति बन्ध बन्धने क्रिन्। बन्ध्यम्। विफलम्। निर्वीर्यम्। (विष्कन्धम्)। अ० १।१६।३। वि+स्कन्दिर् गतिशोषणयोः-अच्। विशेषेण शोषकम्। विघ्नजातम्। (मुष्काबर्हः)। सृवृभूशुषिमुषिभ्यः कक्। उ० ३।४१। इति मुष लुण्ठने, वधे च, कक्। कर्मण्यण्। पा० ३।२।१। इति मुष्क+आङ्-बर्ह वधे दीप्तौ च-अण्। मुष्कम् अण्डकोषम्। आवृहति उन्मूलयतीति। अण्डकोषछेदकः। (गवाम्)। पुंगवानाम्। (इव)। यथा ॥
