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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
प्रीति उत्पन्न करने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - [हे मनुष्यों !] (वः) तुम्हारे (मनांसि) मनों को (सम्) ठीक रीति से, (व्रता=व्रतानि) कर्मों को (सम्) ठीक रीति से, (आकूतीः) संकल्पों को (सम्) ठीक रीति से (नमामसि=०−मः) हम झुकते हैं। (अमी ये) यह जो तुम (विव्रताः) विरुद्ध कर्मी (स्थन) हो, (तान् वः) उन तुमको (सम्) ठीक रीति से (नमयामसि=०−मः) हम झुकाते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - प्रधान पुरुष सबके उत्तम विचारों, उत्तम कर्मों और उत्तम मनोरथों को माने और धर्मपथ में विरुद्ध मतवालों को भी सहमत कर लेवे ॥५॥
टिप्पणी: ५−(सम्)। षो नाशने-कमु। स्यति अनर्थान् सम्यक्। यथाविधि। (वः)। युष्माकम्। (मनांसि)। मननानि। (चेतांसि)। (व्रता)। अ० २।३०।२। कर्माणि-निघ० २।१। (आकूतीः)। अ० ३।२।२। सङ्कल्पान्। मनोरथान्। (नमामसि)। इदन्तो मसि। पा० ७।१।४६। इति मसः स्थाने मसि। वयं नमामः। नम्रीभवामः। (अमी)। समीपस्थाः। (ये)। पुरुषाः। (विव्रताः)। विरुद्धकर्माणः। (स्थन)। अ० १।३१।२। यूयं स्थः। वर्तध्वे। (तान्)। पूर्वोक्तान्। (वः)। युष्मान् (नमयामसि)। णम नम्रीभावे। णिच, लट्। नमयामः। प्रह्वीकुर्मः। नम्रीकुर्मः ॥
