अ॒मू ये दि॒वि सु॒भगे॑ वि॒चृतौ॒ नाम॒ तार॑के। वि क्षे॑त्रि॒यस्य॑ मुञ्चतामध॒मं पाश॑मुत्त॒मम् ॥
पद पाठ
अमू इति । ये इति । दिवि । सुभगे इति । सुऽभगे । विऽचृतौ । नाम । तारके इति । वि । क्षेत्रियस्य । मुञ्चताम् । अधमम् । पाशम् । उत्ऽतमम् ॥७.४॥
अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:7» पर्यायः:0» मन्त्र:4
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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
रोग नाश करने के लिए उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (अमू) वे (ये) जो (सुभगे) बड़े ऐश्वर्यवाले (विचृतौ) [अन्धकार से] छुड़ानेवाले (नाम) प्रसिद्ध (तारके) दो तारे [सूर्य और चन्द्रमा] (दिवि) आकाश में हैं, वे दोनों (क्षेत्रियस्य) शरीर वा वंश के दोष वा रोग के (अधमम्) नीचे और (उत्तमम्) ऊँचे (पाशम्) पाश को (वि+मुञ्चताम्) छुड़ा देवे ॥४॥
भावार्थभाषाः - जैसे सूर्य और चन्द्रमा परस्पर आकर्षण से प्रकाश, वृष्टि और पुष्टि आदि देकर संसार का उपकार करते हैं, इसी प्रकार मनुष्य सुमार्ग में चलकर सब विघ्नों को हटाकर स्वस्थ और यशस्वी हों ॥४॥ यह मन्त्र अ० २।८।१। में कुछ भेद से आ चुका है ॥
टिप्पणी: ४−(अमू)। परिदृश्यमाने। (ये)। ज्ञाते। (दिवि)। द्युलोके। आकाशे। (सुभगे)। शोभनैश्वर्ययुक्ते। शिष्टं व्याख्यातम्-अ० २।८।१ ॥
