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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
उत्साह बढ़ाने के लिये उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (एनान्) इन [शत्रुओं] को (मनसा) मननशक्ति से, (चित्तेन) ज्ञानशक्ति से (उत) और (ब्रह्मणा) वेदशक्ति से (प्र प्र) सर्वथा (नुदे) मैं हटाता हूँ। (एनान्) इनको (वृक्षस्य) स्वीकार करने योग्य (अश्वत्थस्य) बलवानों में ठहरनेवाले शूर [वा पीपल] की (शाखया) व्याप्ति [वा शाखा] से (प्र, नुदामहे) हम निकाले देते हैं ॥८॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक व्यक्ति और सब लोग मिलकर शूरवीर वा पीपल के प्रभाव से आगा-पीछा विचारकर शत्रुओं को नष्ट कर देते हैं ॥८॥
टिप्पणी: ८−(एनान्)। पूर्वोक्तान् शत्रून्। (नुदे)। णुद प्रेरणे। स्वरितेत्त्वाद् आत्मनेपदम्। प्रेरयामि। निः सारयामि। (मनसा)। मननशक्त्या। (चित्तेन)। चिती ज्ञाने-क्तः। ज्ञानशक्त्या। (ब्रह्मणा)। वेदविज्ञानेन। (वृक्षस्य)। इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः। पा० ३।१।१३५। इति वृक्षावरणे-क। वरणीयस्य। विटपस्य वा। (शाखया)। शाख व्याप्तौ अच्, टाप्। व्याप्त्या। पूर्णतया। वृक्षावयवेन। (अश्वत्थस्य)। म० १। बलवत्सु स्थितिशीलस्य शूरस्य। पिप्पलस्य। (नुदामहे)। प्रेरयामः ॥
