पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
तेज, बल, आयु, धनादि बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पर्णमणिः) पालन करनेवालों में श्रेष्ठ परमेश्वर (मह्यै अरिष्टतातये) बड़ी कुशलता के लिये (मा) मेरे (आ, अरुक्षत्) ऊपर बैठा है। (यथा) जिससे (अहम्) मैं (अर्यम्णः) श्रेष्ठों के मान करनेवाले, (उत) और (संविदः) ज्ञानी पुरुष से (उत्तरः) अधिक श्रेष्ठ (असानि) हो जाऊँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - सर्वोपरि परमेश्वर अन्तर्यामी होकर हमें दुष्कर्मों से बचने की प्रेरणा करता है, जिससे हम श्रेष्ठों में अति श्रेष्ठ और ज्ञानियों में अति ज्ञानी होवें ॥५॥
टिप्पणी: ५−(मा)। माम्। (आ, अरुक्षत्)। रुह जन्मप्रादुर्भावयोः-लुङ्। आरूढवान्। उपरि विराजमानोऽभूत्। (पर्णमणिः)। म० १ पालकेषु श्रेष्ठः। (मह्यै)। महत्यै। (अरिष्टतातये)। रिष हिंसायाम्-क्त। रिष्टं हिंसनम्। उपद्रवः। उत्पातः। नञ्समासः। शिवशमरिष्टस्य करे। पा० ४।४।१४३। इति अरिष्ट-करोत्यर्थे तातिल्। प्रत्ययः। लिति। पा० ६।१।१९३। इति प्रत्ययात् पूर्वस्य उदात्तः। रिष्टवर्जनाय। अनुपद्रवाय। क्षेमकरणाय। (यथा)। येन प्रकारेण। (अहम्)। परमेश्वरोपासकः। (उत्तरः)। उत्कृष्टः। (असानि)। अस्तेर्लोट्। भवानि। (अर्यम्णः)। श्वन्नुक्षन्पूषन्प्लीहन् उ० १।१५९। इति अर्य+माङ् माने शब्दे च-कनिन्। अर्यान् श्रेष्ठान् मातीति। श्रेष्ठानां सत्कारकात्। (उत)। अपि च। (संविदः)। सम्+विद ज्ञाने-क्विप्। ज्ञानिनः पुरुषात् ॥
