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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (प्राणताम्) जीते हुओं के (प्राणेन) श्वास से (प्राण) श्वास ले, (इह) यहाँ पर (एव) ही (भव) रह, (मा मृथाः) मरा मत जा। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब पाप कर्म से... [म० १] ॥९॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य पुरुषार्थियों के समान अपने श्वास-श्वास पर कर्तव्य करे और संसार में रहकर भूल, आलस्य आदि दोष छोड़कर कीर्ति पावे ॥९॥
टिप्पणी: ९−(प्राणेन) प्रकृष्टजीवनेन। श्वासप्रश्वासव्यापारेण। (प्राणताम्) प्र+अन जीवने-शतृ। श्वसताम्। आत्मवत्ताम्। (प्राण) प्राणान् धारय। (इह एव) अस्मिन्नेव जन्मनि लोके वा। (भव) वर्तस्व। अन्यद् गतम् ॥
