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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (आयुष्मताम्) बड़ी आयुवाले, और [दूसरों की] (आयुष्कृताम्) बड़ी आयु करनेवाले [देवताओं] के (प्राणेन) प्राण के साथ (जीव) जीता रह, (मा मृथाः) मरा मत जा। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब पाप कर्म से... [म० १] ॥८॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य अपने और दूसरों के सुधारनेवाले वीर योगियों [देवताओं-म०] के अनुकरणी होकर पुरुषार्थ करें और आलस्य आदि में व्यर्थ जन्म न खोवें ॥८॥
टिप्पणी: ८−(आयुष्मताम्) प्रशस्तेन दीर्घेणायुषा तद्वताम्। (आयुष्कृताम्)। अन्येषां प्रशस्तदीर्घायुषः कर्तॄणां देवानाम्-म० ७। (प्राणेन) अ० २।१५।१। जीवनबलेन। (जीव) प्राणान् धारय। (मा मृथाः) मृङ् प्राणत्यागे-लुङ्, माङि अडभावः। प्राणान् मा त्याक्षीः। अन्यद् गतम् ॥
