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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (देवाः) विजय चाहनेवाले महात्माओं ने (विश्वतोवीर्यम्) सब ओर से वीर्यवान् (सूर्यम्) सर्वप्रेरक वा सर्वत्रगति परमेश्वर वा सूर्य को (प्राणेन) प्राण से (सम्) मिलकर (ऐरयन्) पाया है। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब पाप कर्म से... [म० १] ॥७॥
भावार्थभाषाः - जितेन्द्रिय वीरों ने आत्मा के सहारे, अर्थात् आत्मज्ञान और आत्मबल से, परमात्मा को पाकर और सूर्य आदि लोकों तक गति करके परम पद पाया है। मनुष्य आत्मिक और शारीरिक दोष मिटाकर जीवन सफल करें ॥७॥
टिप्पणी: ७−(प्राणेन) जीवनहेतुना। (विश्वतीवीर्यम्) सर्वतःसामर्थ्यम्। सर्वशक्तिमन्तम्। (देवाः) विजिगीषवो जितेन्द्रिया योगिनः। (सूर्यम्) अ० १।३।५। सुवति प्रेरयति लोकान् सूर्यं वा सरति सर्वत्र स सूर्यः। लोकप्रेरकम्। सर्वत्रगतिं परमात्मानं (सम्) सम्भूय। (ऐरयन्) अ० १।११।२। ईर गतौ-लङ्। अगच्छन्। प्राप्नुवन्। अन्यद् गतम् ॥
