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वी॑ मे द्यावा॑पृथि॒वी इ॒तो वि पन्था॑नो॒ दिशं॑दिशम्। व्यहं सर्वे॑ण पा॒प्मना॒ वि यक्ष्मे॑ण॒ समायु॑षा ॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

वि । इमे इति । द्यावापृथिवी इति । इत: । वि । पन्थान: । दिशम्ऽदिशम् । वि । अहम् । सर्वेण । पाप्मना । वि । यक्ष्मेण । सम् । आयुषा ॥३१.४॥

अथर्ववेद » काण्ड:3» सूक्त:31» पर्यायः:0» मन्त्र:4


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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी

आयु बढ़ाने का उपदेश।

पदार्थान्वयभाषाः - (इमे) ये दोनों (द्यावापृथिव्यौ) सूर्य और पृथिवी (वि) अलग-अलग (इतः) चलते हैं, (पन्थानः) सब मार्ग (दिशंदिशम्) दिशा दिशा को (वि=वियन्ति) अलग-अलग जाते हैं। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब पाप कर्म से... [म० १] ॥४॥
भावार्थभाषाः - सूर्य पृथिवी और मार्ग अलग-अलग रहकर संसार का क्लेश हरते हैं, ऐसे ही सब मनुष्य दुःख का नाश करके सुख भोगें ॥४॥
टिप्पणी: ४−(इमे) परिदृश्यमाने। (द्यावापृथिव्यौ) अ० २।१।४। सूर्यभूमी। (इतः) गच्छतः। (पन्थानः) मार्गाः। (वि) वियन्ति। अन्यद् गतम् ॥