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पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी
आयु बढ़ाने का उपदेश।
पदार्थान्वयभाषाः - (पवमानः) शोधन करनेवाला पुरुष (आर्त्या) पीड़ा से (वि) अलग, और (शक्रः) शक्तिमान् पुरुष (पापकृत्यया) पाप क्रिया से (वि=वि वर्तताम्) अलग रहे। (अहम्) मैं (सर्वेण पाप्मना) सब पाप कर्म से... [म० १] ॥२॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य शुद्ध आचरण से सामाजिक आत्मिक और शारीरिक पीड़ा मिटावे और बलवान् होकर पाप को हटावे ॥२॥
टिप्पणी: २−(वि) विवर्तताम्। वियुक्तो भवतु। (आर्त्या) आङ्+ऋ हिंसने-क्तिन्। पीडया। रोगेन। (पवमानः) पूङ्यजोः शानन्। पा० ३।२।१८। इति पूञ् शोधने-शानन्। आने मुक्। पा० ७।२।८२। इति मुक्। संशोधकः (शक्रः) अ० २।५।४। शक्तः। इन्द्रः। (पापकृत्यया) पापम् इति व्याख्यातम्-अ० २।१२।५। कृञः श च। पा० ३।३।१०। इति डुकृञ् करणे, यद्वा, कृञ् हिंसायाम्-क्यप्, तुक्। पापक्रियया महाहिंसया। अन्यद् गतम्-म० १ ॥
